क्या सच में मालचा महल भूतिया है: मालचा महल का अनसुना कहानी

दिल्ली के हृदय स्थल चाणक्यपुरी के पास, जहाँ आधुनिकता और कूटनीति के चमकते चेहरे बसते हैं, वहीं ‘सेंट्रल रिज’ का घना जंगल एक पुराने जख्म की तरह मौजूद है। इस जंगल की भूलभुलैया के बीच खड़ा है ‘मालचा महल’—एक ऐसी इमारत जो ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि खौफ, तन्हाई और एक शाही परिवार के अटूट स्वाभिमान से बनी है। 14वीं शताब्दी में फिरोज शाह तुगलक ने इसे अपनी थकान मिटाने के लिए एक शिकारगाह के रूप में बनवाया था, लेकिन समय के क्रूर चक्र ने इसे एक ऐसी जेल में बदल दिया जहाँ से मौत के अलावा कुछ बाहर नहीं निकला।

malchha mahal

इस कहानी का सूत्रपात 1970 के दशक में हुआ, जब दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक रहस्यमयी महिला का आगमन हुआ। खुद को अवध की बेगम बताने वाली ‘विलायत महल’ ने अपनी खोई हुई रियासत के हक के लिए स्टेशन के वीआईपी वेटिंग रूम को ही अपना घर बना लिया। उनके साथ उनके दो बच्चे, शहजादी सकीना और शहजादा अली रज़ा, और कई खूंखार शिकारी कुत्ते थे। सालों के कड़े संघर्ष और जिद के बाद, 1985 में सरकार ने उन्हें रहने के लिए यह वीरान मालचा महल सौंप दिया। लेकिन यह ‘महल’ नाम के विपरीत, केवल पत्थरों का एक नग्न ढांचा था, जिसमें न तो कोई खिड़की थी और न ही बिजली या पानी का कोई साधन।

मालचा महल की ऊंची प्राचीरों के पीछे एक ऐसी दुनिया बसी जहाँ बाहरी दुनिया का प्रवेश वर्जित था। बेगम ने महल के चारों ओर कँटीले तारों का घेरा बनवाया और एक चेतावनी टांग दी—”बिन बुलाए आने वालों को गोली मार दी जाएगी।” यह महज धमकी नहीं थी, बल्कि एक घायल स्वाभिमान की पुकार थी। सालों तक यह परिवार उसी अंधेरे और सीलन भरे खंडहर में रहा। उनके पास केवल उनकी पुरानी यादें और उन शिकारी कुत्तों का साथ था, जो रात के सन्नाटे में जंगल की भयावहता को और बढ़ा देते थे।

malchha mahal inner view

त्रासदी का पहला काला साया 1993 में पड़ा, जब बेगम विलायत महल ने कथित तौर पर एक हीरा निगलकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। कहा जाता है कि उनके बच्चे इस कदर टूट गए थे कि उन्होंने अपनी माँ के शव को हफ़्तों तक नहीं दफनाया। वे उसी खंडहर में अपनी मृत माँ के पास बैठे रहे, मानो वे मृत्यु को मात देना चाहते हों। इस घटना के बाद से ही स्थानीय निवासियों और वन रक्षकों के बीच यह चर्चा आम हो गई कि महल की दीवारों के पीछे आज भी बेगम की रूह अपने बच्चों की पहरेदारी करती है।

धीरे-धीरे शहजादी सकीना की भी मृत्यु हो गई, और अंत में बचा केवल शहजादा अली रज़ा। नवंबर 2017 की एक ठंडी सुबह, जब पुलिस और पुरातत्व विभाग के लोग अंदर दाखिल हुए, तो उन्होंने देखा कि अवध की आखिरी निशानी अली रज़ा उसी खंडहर के फर्श पर मृत पड़े थे। उनके पास केवल एक पुराना रेडियो, कुछ जंग लगे बर्तन और यादों के ढेर के अलावा कुछ नहीं था। उनके जाते ही वह रहस्यमयी परिवार तो खत्म हो गया, लेकिन पीछे छोड़ गया एक ऐसा सन्नाटा जिसे आज भी मालचा महल की हवाओं में महसूस किया जा सकता है।

आज जब शाम ढलती है और रिज के जंगल में परिंदों का शोर थम जाता है, तब मालचा महल की काली आकृति किसी दैत्य की तरह खड़ी नजर आती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि वहाँ महसूस होने वाली ‘अजीब ठंडक’ और ‘भारेपन’ का कारण वहाँ का भौगोलिक वातावरण और वह मानवीय पीड़ा है जो उन दीवारों ने दशकों तक सोखी है। यह महल आज एक ऐतिहासिक स्मारक तो है, लेकिन इसके हर कोने में उस तन्हाई की गूँज है जिसने एक पूरे शाही वंश को निगल लिया। यह केवल एक भूतिया इमारत नहीं, बल्कि मानवीय जिद और त्रासदी का जीवित स्मारक है।

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